मुंबई में नारीमन प्वाइंट के पास सुपरकॉप हिमांशु रॉय के घर शुक्रवार दोपहर तकरीबन डेढ़ बजे लंच की तैयारियां हो रही थीं. हिमांशु अपने बेडरूम में थे और पत्नी भावना दूसरे कमरे में थीं. अचानक एक गोली की आवाज के साथ हिमांशु की सांसें थम गईं. उन्होंने अपनी सर्विस रिवाल्वर से खुदकुशी कर ली. पत्नी और घरेलू स्टाफ ने उनको अस्पताल पहुंचाया, जहां उनको मृत घोषित कर दिया गया. मुंबई पुलिस की इस पीढ़ी के सबसे जांबाज अफसरों में शुमार हिमांशु रॉय की खुदकुशी ने जितना दुख पहुंचाया, उतना ही लोगों को चौंका भी दिया.
ऐसा इसलिए क्योंकि उनको जानने वालों का कहना है कि जितनी मजबूत कद-काठी उनकी थी, उतने ही वह दृढ़ इच्छाशक्ति के भी धनी थे. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पहली बार उनको किडनी कैंसर के बारे में वर्ष 2000 में पता चला था. जिस किडनी में कैंसर था, उस वक्त सर्जरी के जरिये उसको निकाल दिया गया था. उसके बाद के दौर में उनको एक से बढ़कर एक पोस्टिंग मिलीं और उन्होंने आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग जैसे अहम केसों को सॉल्व किया. उस दौरान अक्सर मीडिया से बात करने वाले हिमांशु की बॉडी लैंग्वेज से कभी किसी को पता नहीं चला कि वह कैंसर से लड़ चुके हैं. दूसरी बार 2016 में दोबारा इसी कैंसर की वापसी हुई और उसके बाद ही वह मेडिकल छुट्टी पर गए.
सुसाइड नोट
मौत के बाद हिमांशु का एक सुसाइड नोट मिला है. इसमें उन्होंने कहा है कि वह इस बीमारी के कारण डिप्रेशन में थे और इस कदम के लिए किसी अन्य को जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए. इस संबंध में पुणे के मेडिकल ओनकोलॉजिस्ट डॉ अनंत भूषण रानाडे ने द टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत करते हुए कहा कि मैं यह समझ नहीं पा रहा हूं कि इस बीमारी से 18 साल तक मजबूती से लड़ने वाले हिमांशु ने आखिर जान क्यों दी? डॉ रानाडे उनका दो साल से इलाज कर रहे थे.
ऐसा इसलिए भी क्योंकि चार दिन पहले ही डॉक्टरों ने हिमांशु से कहा था कि वह अब कीमोथेरेपी और टारगेटेड थेरेपी से कुछ समय तक ब्रेक ले सकते हैं क्योंकि उनकी मेडिकल रिपोर्ट्स अब बेहतर हैं. डॉ रानाडे ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि सोमवार को मैंने उनसे कहा था कि उनकी पीईटी स्कैन रिपोर्ट्स पॉजिटिव दिख रही हैं. उनको बताया गया कि थेरेपी काम कर रही हैं और अब हमारे पास बीमारी को हराने का चांस है. उनसे यह भी कहा कि अब कुछ दिनों के लिए इलाज रोक देते हैं. रॉय पिछले साल रेडियोथेरेपी के लिए पुर्तगाल भी गए थे. उनका इलाज पुणे और मुंबई में चल रहा था.
फिर आखिर क्यों?
इसका जवाब देने की कोशिश करते हुए टाटा मेमोरियल अस्पताल की डॉ मेरी ऐन मुकाडेन ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि कैंसर रोगियों की चिंताओं और डिप्रेशन की भी पहचान की जरूरत है. खासकर उस वक्त जब डायग्नोसिस होने के बाद रोगी लंबे समय तक जीता है और बीमारी दोबारा लौट आती है. अगर आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो हिमांशु रॉय का केस बहुत असामान्य नहीं है. इस तरह की गंभीर या क्रॉनिक बीमारियों के कारण रोजाना 62 लोग आत्महत्या कर लेते हैं. 2015 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक हर साल इस तरह की गंभीर बीमारी के कारण 22 हजार लोग आत्महत्या करते हैं. यानी पारिवारिक कारणों के बाद इस तरह की गंभीर बीमारियों के कारण ही सबसे ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं.
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