The real history:: ग्रन्थ नहीं कहते कि शराब पीना ही क्षत्रिय धर्म है । ये सिर्फ़ एक मुग़लों की साजिश थी, हिन्दुओं को कमजोर करने की ।
आइये, जानिये एक अनकही ऐतिहासिक सत्य घटना । "एक षड्यंत्र और शराब की घातकता" - कैसे हिन्दुओं की सुरक्षा प्राचीर को ध्वस्त किया मुग़लों ने ? जानिये और फिर सुधार कीजिये ।
मुगल बादशाह का दिल्ली में दरबार लगा था और हिन्दुस्तान के दूर-दूर के राजा, महाराजा दरबार में हाजिर थे । उसी दौरान मुगल बादशाह ने एक दम्भोक्ति की - "है, कोई हमसे बहादुर इस दुनिया में ?" सभा में सन्नाटा-सा पसर गया । एक बार फिर वही दोहराया गया । तीसरी बार फिर उसने ख़ुशी से चिल्ला कर कहा - "है, कोई हमसे बहादुर जो हिन्दुस्तान पर सल्तनत कायम कर सके ?"
सभा की खामोशी तोड़ती एक बुलन्द शेर-सी दहाड़ गूंजी तो सबका ध्यान उस शख्स की ओर गया । वो थे, जोधपुर के महाराजा राव रिड़मल जी । राव रिड़मल जी ने कहा - "मुग़लों में बहादुरी नहीं, कुटिलता है । सबसे बहादुर तो राजपूत हैं, दुनियाँ में । मुगलों ने राजपूतों को आपस में लड़वाकर हिन्दुस्तान पर राज किया । कभी सिसोदिया राणा वंश को कछावा जयपुर से, तो कभी राठोड़ों को दूसरे राजपूतों से ।" बादशाह का मुँह देखने लायक था । ऐसा लगा, जैसे किसी ने चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया हो ।
बादशाह झल्लाहट से बोला - "बातें मत करो, राव ! उदाहरण दो वीरता का ।"
रिड़मल ने कहा - "क्या किसी कौम में देखा है, किसी को सिर कटने के बाद भी लड़ते हुए ?"
बादशाह बोला - "ये तो सुनी हुई बात है, राव ! देखा तो नहीं ।"
रिड़मल बोले - "इतिहास उठाकर देख लो, कितने वीरों की कहानियाँ हैं, सिर कटने के बाद भी लड़ने की ।"
बादशाह हँसा और दरबार में बैठे कवियों की ओर देखकर बोला - "इतिहास लिखने वाले तो मंगते होते हैं । मैं भी 100 मुगलों के नाम लिखवा दूँ, इसमें क्या ? मुझे तो जिन्दा ऐसा राजपूत बताओ । जो कहे कि "मेरा सिर काट दो, मैं फिर भी लड़ूंगा ।"
राव रिड़मल निरुत्तर हो गए और गहरे सोच में डूब गए । रात को सोचते-सोचते अचानक उनको रोहणी ठिकाने के जागीरदार का ख्याल आया । रात को 11 बजे रोहणी ठिकाना (जो कि जेतारण कस्बे जोधपुर रियासत) में दो घुड़सवार बुजुर्ग जागीरदार के पोल पर पहुँचे और मिलने की इजाजत मांगी ।
ठाकुर साहब काफी वृद्ध अवस्था में थे, फिर भी उठकर मेहमान की आवभक्त के लिए बाहर पोल पर आये ।" घुड़सवारों ने प्रणाम किया और वृद्ध ठाकुर की आँखों में चमक सी उभरी और मुस्कराते हुए बोले - "जोधपुर महाराज ! आपको मैंने गोद में खिलाया है और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी है । इस तरह भेष बदलने पर भी मैं आपको आवाज से पहचान गया हूँ । हुकूम, आप अन्दर पधारो । मैं आपकी रियासत का छोटा-सा जागीरदार, आपने मुझे ही बुलवा लिया होता ।"
राव रिड़मल ने उनको झुककर प्रणाम किया और बोले - "एक समस्या है । फिर, बादशाह के दरबार की पूरी कहानी सुना दी । अब आप ही बतायें कि जीवित योद्धा का कैसे पता चले कि "ये लड़ाई में सिर कटने के बाद भी लड़ेगा ?"
रोहणी जागीदार बोले - "बस, इतनी-सी बात ! मेरे दोनों बच्चे सिर कटने के बाद भी लड़ेंगे और आप दोनों को ले जाओ, दिल्ली दरबार में । ये आपकी और राजपूती की लाज जरूर रखेंगे ।"
राव रिड़मल को घोर आश्चर्य हुआ कि एक पिता को कितना विश्वास है, अपने बच्चों पर । मान गए राजपूती धर्म को । सुबह जल्दी दोनों बच्चे अपने-अपने घोड़ों के साथ तैयार थे । उसी समय ठाकुर साहब ने कहा - "महाराज, थोड़ा रुकिए । मैं एक बार इनकी माँ से भी कुछ चर्चा कर लूँ, इस बारे में ।"
राव रिड़मल ने सोचा आखिर पिता का हृदय है, कैसे मानेगा अपने दोनों जवान बच्चों के सिर कटवाने को ? एक बार रिड़मल जी ने सोचा कि मुझे दोनों बच्चों को यहीं छोड़कर चले जाना चाहिए ।
ठाकुर साहब ने ठकुराईन जी को कहा - "आपके दोनों बच्चों को दिल्ली मुगल बादशाह के दरबार में भेज रहा हूँ, सिर कटवाने को । दोनों में से कौन-सा सिर कटने के बाद भी लड़ सकता है ? आप माँ हो, आपको ज्यादा पता होगा ।"
ठकुराईन जी ने कहा - "बड़ा लड़का तो क़िले और क़िले के बाहर तक भी लड़ लेगा । पर, छोटा केवल परकोटे में ही लड़ सकता है । क्योंकि पैदा होते ही इसको मेरा दूध नहीं मिला था । लड़ दोनों ही सकते हैं, आप निश्चिन्त होकर भेज दो ।"
दिल्ली के दरबार में आज कुछ विशेष भीड़ थी । हजारों लोग इस दृष्य को देखने के लिए जमा थे । बड़े लड़के को मैदान में लाया गया और मुगल बादशाह ने जल्लादों को आदेश दिया कि "इसकी गर्दन उड़ा दो ।"
तभी बीकानेर महाराजा बोले - "ये क्या तमाशा है ? राजपूती इतनी भी सस्ती नहीं हुई है । लड़ाई का मौका दो और फिर देखो, कौन बहादुर है ?"
बादशाह ने खुद के सबसे मजबूत और कुशल योद्धा बुलाये और कहा - "ये जो घुड़सवार मैदान में खड़ा है, उसका सिर काट दो ।" 20 घुड़सवारों का दल रोहणी ठाकुर के बड़े लड़के का सिर उतारने को लपका और देखते ही देखते उन 20 घुड़सवारों की लाशें मैदान में बिछ गयीं ।
दूसरा दस्ता आगे बढ़ा और उनका भी वही हाल हुआ । मुगलों में घबराहट और झुरझरी फैल गयी । इसी तरह बादशाह के 500 सबसे ख़ास योद्धाओं की लाशें मैदान में पड़ी थीं और उस वीर राजपूत योद्धा को तलवार की खरोंच भी नहीं आई ।
यह देखकर मुगल सेनापति ने कहा - "500 मुगल बीवियाँ विधवा कर दीं, आपकी इस परीक्षा ने । अब और मत कीजिये, हुज़ूर ! इस काफ़िर को गोली मरवाईए । तलवार से यह नहीं मरेगा ।"कुटिलता और मक्कारी से भरे मुगलों ने उस वीर के सिर में गोलियाँ मार दीं । सिर के परखचे उड़ चुके थे । पर, धड़ ने तलवार की मजबूती कम नहीं करी और मुगलों का कत्लेआम खतरनाक रूप से चलता रहा ।
बादशाह ने छोटे भाई को अपने पास निहत्थे बैठा रखा था, यह सोचकर कि बड़ा यदि बहादुर निकला तो इस छोटे भाई को कोई जागीर देकर अपनी सेना में भर्ती कर लूंगा । लेकिन जब छोटे भाई ने यह अन्याय देखा तो उसने झपटकर बादशाह की तलवार निकाल ली । उसी समय बादशाह के अंगरक्षकों ने उसकी गर्दन काट दी, फिर भी धड़ तलवार चलाता गया और अंगरक्षकों समेत मुगलों का काल बन गया ।
बादशाह भागकर कमरे में छुप गया । बाहर मैदान में बड़े भाई और अन्दर परकोटे में छोटे भाई का पराक्रम देखते ही बनता था । हजारों की संख्या में मुगल हताहत हो चुके थे और आगे का कुछ पता नहीं था । बादशाह ने चिल्लाकर कहा - 'अरे, कोई रोको इनको ।'
एक मौलवी आगे आया और बोला - "इन पर शराब छिड़क दो । राजपूत का इष्ट कमजोर करना हो तो शराब का उपयोग करो ।" दोनों भाइयों पर शराब छिड़की गयी । ऐसा करते ही दोनों के शरीर ठण्डे पड़ गए ।
मौलवी ने बादशाह को कहा - "हजूर ! यह लड़ने वाला इनका शरीर नहीं, बल्कि इनकी इष्ट देवी है और ये राजपूत शराब से दूर रहते हैं । अपने धर्म और इष्ट को मजबूत रखते हैं । यदि मुगलों को हिन्दुस्तान पर शासन करना है तो इनका इष्ट और धर्म भ्रष्ट करो । इनको दारु (शराब) की लत लगाओ । यदि मुगलों में से ये कमियाँ हटा दें तो मुगल भी मजबूत बन जायेंगे ।"
उसके बाद से ही राजपूतों में मुगलों ने शराब का प्रचलन चलाया और धीरे-धीरे राजपूत शराब में डूबते चले गए और अपनी इष्ट देवी को नाराज करते गए । मुगलों ने मुसलमानों को कसम दिलवाई कि शराब पीने के बाद नमाज नहीं पढ़ी जाये । इसलिए इससे दूर रहिये ।
मांसाहार जैसी राक्षसी प्रवृत्ति पर गर्व करने वाले राजपूतों को यदि ज्ञात हो तो बतायें और आत्म मंथन करें कि "महाराणा प्रताप की बेटी की मृत्यु जंगल में भूख से हुई थी, क्यों ? यदि वो मांसाहारी होते तो जंगल में उन्हें जानवरों की कमी थी क्या, मारकर खाने के लिए ?"
इसका मतलब कि राजपूत हमेशा शाकाहारी ही थे । केवल कुछ स्वार्थी राजपूतों ने जिन्होंने मुगलों की आधिनता स्वीकार कर ली थी, वे राजपूत मुगलों को खुश करने के लिए उनके साथ मांसाहार करने लगे और अपने आपको मुगलों का विश्वासपात्र साबित करने की होड़ में गिरते चले गये ।
आइये, जानिये एक अनकही ऐतिहासिक सत्य घटना । "एक षड्यंत्र और शराब की घातकता" - कैसे हिन्दुओं की सुरक्षा प्राचीर को ध्वस्त किया मुग़लों ने ? जानिये और फिर सुधार कीजिये ।
मुगल बादशाह का दिल्ली में दरबार लगा था और हिन्दुस्तान के दूर-दूर के राजा, महाराजा दरबार में हाजिर थे । उसी दौरान मुगल बादशाह ने एक दम्भोक्ति की - "है, कोई हमसे बहादुर इस दुनिया में ?" सभा में सन्नाटा-सा पसर गया । एक बार फिर वही दोहराया गया । तीसरी बार फिर उसने ख़ुशी से चिल्ला कर कहा - "है, कोई हमसे बहादुर जो हिन्दुस्तान पर सल्तनत कायम कर सके ?"
सभा की खामोशी तोड़ती एक बुलन्द शेर-सी दहाड़ गूंजी तो सबका ध्यान उस शख्स की ओर गया । वो थे, जोधपुर के महाराजा राव रिड़मल जी । राव रिड़मल जी ने कहा - "मुग़लों में बहादुरी नहीं, कुटिलता है । सबसे बहादुर तो राजपूत हैं, दुनियाँ में । मुगलों ने राजपूतों को आपस में लड़वाकर हिन्दुस्तान पर राज किया । कभी सिसोदिया राणा वंश को कछावा जयपुर से, तो कभी राठोड़ों को दूसरे राजपूतों से ।" बादशाह का मुँह देखने लायक था । ऐसा लगा, जैसे किसी ने चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया हो ।
बादशाह झल्लाहट से बोला - "बातें मत करो, राव ! उदाहरण दो वीरता का ।"
रिड़मल ने कहा - "क्या किसी कौम में देखा है, किसी को सिर कटने के बाद भी लड़ते हुए ?"
बादशाह बोला - "ये तो सुनी हुई बात है, राव ! देखा तो नहीं ।"
रिड़मल बोले - "इतिहास उठाकर देख लो, कितने वीरों की कहानियाँ हैं, सिर कटने के बाद भी लड़ने की ।"
बादशाह हँसा और दरबार में बैठे कवियों की ओर देखकर बोला - "इतिहास लिखने वाले तो मंगते होते हैं । मैं भी 100 मुगलों के नाम लिखवा दूँ, इसमें क्या ? मुझे तो जिन्दा ऐसा राजपूत बताओ । जो कहे कि "मेरा सिर काट दो, मैं फिर भी लड़ूंगा ।"
राव रिड़मल निरुत्तर हो गए और गहरे सोच में डूब गए । रात को सोचते-सोचते अचानक उनको रोहणी ठिकाने के जागीरदार का ख्याल आया । रात को 11 बजे रोहणी ठिकाना (जो कि जेतारण कस्बे जोधपुर रियासत) में दो घुड़सवार बुजुर्ग जागीरदार के पोल पर पहुँचे और मिलने की इजाजत मांगी ।
ठाकुर साहब काफी वृद्ध अवस्था में थे, फिर भी उठकर मेहमान की आवभक्त के लिए बाहर पोल पर आये ।" घुड़सवारों ने प्रणाम किया और वृद्ध ठाकुर की आँखों में चमक सी उभरी और मुस्कराते हुए बोले - "जोधपुर महाराज ! आपको मैंने गोद में खिलाया है और अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी है । इस तरह भेष बदलने पर भी मैं आपको आवाज से पहचान गया हूँ । हुकूम, आप अन्दर पधारो । मैं आपकी रियासत का छोटा-सा जागीरदार, आपने मुझे ही बुलवा लिया होता ।"
राव रिड़मल ने उनको झुककर प्रणाम किया और बोले - "एक समस्या है । फिर, बादशाह के दरबार की पूरी कहानी सुना दी । अब आप ही बतायें कि जीवित योद्धा का कैसे पता चले कि "ये लड़ाई में सिर कटने के बाद भी लड़ेगा ?"
रोहणी जागीदार बोले - "बस, इतनी-सी बात ! मेरे दोनों बच्चे सिर कटने के बाद भी लड़ेंगे और आप दोनों को ले जाओ, दिल्ली दरबार में । ये आपकी और राजपूती की लाज जरूर रखेंगे ।"
राव रिड़मल को घोर आश्चर्य हुआ कि एक पिता को कितना विश्वास है, अपने बच्चों पर । मान गए राजपूती धर्म को । सुबह जल्दी दोनों बच्चे अपने-अपने घोड़ों के साथ तैयार थे । उसी समय ठाकुर साहब ने कहा - "महाराज, थोड़ा रुकिए । मैं एक बार इनकी माँ से भी कुछ चर्चा कर लूँ, इस बारे में ।"
राव रिड़मल ने सोचा आखिर पिता का हृदय है, कैसे मानेगा अपने दोनों जवान बच्चों के सिर कटवाने को ? एक बार रिड़मल जी ने सोचा कि मुझे दोनों बच्चों को यहीं छोड़कर चले जाना चाहिए ।
ठाकुर साहब ने ठकुराईन जी को कहा - "आपके दोनों बच्चों को दिल्ली मुगल बादशाह के दरबार में भेज रहा हूँ, सिर कटवाने को । दोनों में से कौन-सा सिर कटने के बाद भी लड़ सकता है ? आप माँ हो, आपको ज्यादा पता होगा ।"
ठकुराईन जी ने कहा - "बड़ा लड़का तो क़िले और क़िले के बाहर तक भी लड़ लेगा । पर, छोटा केवल परकोटे में ही लड़ सकता है । क्योंकि पैदा होते ही इसको मेरा दूध नहीं मिला था । लड़ दोनों ही सकते हैं, आप निश्चिन्त होकर भेज दो ।"
दिल्ली के दरबार में आज कुछ विशेष भीड़ थी । हजारों लोग इस दृष्य को देखने के लिए जमा थे । बड़े लड़के को मैदान में लाया गया और मुगल बादशाह ने जल्लादों को आदेश दिया कि "इसकी गर्दन उड़ा दो ।"
तभी बीकानेर महाराजा बोले - "ये क्या तमाशा है ? राजपूती इतनी भी सस्ती नहीं हुई है । लड़ाई का मौका दो और फिर देखो, कौन बहादुर है ?"
बादशाह ने खुद के सबसे मजबूत और कुशल योद्धा बुलाये और कहा - "ये जो घुड़सवार मैदान में खड़ा है, उसका सिर काट दो ।" 20 घुड़सवारों का दल रोहणी ठाकुर के बड़े लड़के का सिर उतारने को लपका और देखते ही देखते उन 20 घुड़सवारों की लाशें मैदान में बिछ गयीं ।
दूसरा दस्ता आगे बढ़ा और उनका भी वही हाल हुआ । मुगलों में घबराहट और झुरझरी फैल गयी । इसी तरह बादशाह के 500 सबसे ख़ास योद्धाओं की लाशें मैदान में पड़ी थीं और उस वीर राजपूत योद्धा को तलवार की खरोंच भी नहीं आई ।
यह देखकर मुगल सेनापति ने कहा - "500 मुगल बीवियाँ विधवा कर दीं, आपकी इस परीक्षा ने । अब और मत कीजिये, हुज़ूर ! इस काफ़िर को गोली मरवाईए । तलवार से यह नहीं मरेगा ।"कुटिलता और मक्कारी से भरे मुगलों ने उस वीर के सिर में गोलियाँ मार दीं । सिर के परखचे उड़ चुके थे । पर, धड़ ने तलवार की मजबूती कम नहीं करी और मुगलों का कत्लेआम खतरनाक रूप से चलता रहा ।
बादशाह ने छोटे भाई को अपने पास निहत्थे बैठा रखा था, यह सोचकर कि बड़ा यदि बहादुर निकला तो इस छोटे भाई को कोई जागीर देकर अपनी सेना में भर्ती कर लूंगा । लेकिन जब छोटे भाई ने यह अन्याय देखा तो उसने झपटकर बादशाह की तलवार निकाल ली । उसी समय बादशाह के अंगरक्षकों ने उसकी गर्दन काट दी, फिर भी धड़ तलवार चलाता गया और अंगरक्षकों समेत मुगलों का काल बन गया ।
बादशाह भागकर कमरे में छुप गया । बाहर मैदान में बड़े भाई और अन्दर परकोटे में छोटे भाई का पराक्रम देखते ही बनता था । हजारों की संख्या में मुगल हताहत हो चुके थे और आगे का कुछ पता नहीं था । बादशाह ने चिल्लाकर कहा - 'अरे, कोई रोको इनको ।'
एक मौलवी आगे आया और बोला - "इन पर शराब छिड़क दो । राजपूत का इष्ट कमजोर करना हो तो शराब का उपयोग करो ।" दोनों भाइयों पर शराब छिड़की गयी । ऐसा करते ही दोनों के शरीर ठण्डे पड़ गए ।
मौलवी ने बादशाह को कहा - "हजूर ! यह लड़ने वाला इनका शरीर नहीं, बल्कि इनकी इष्ट देवी है और ये राजपूत शराब से दूर रहते हैं । अपने धर्म और इष्ट को मजबूत रखते हैं । यदि मुगलों को हिन्दुस्तान पर शासन करना है तो इनका इष्ट और धर्म भ्रष्ट करो । इनको दारु (शराब) की लत लगाओ । यदि मुगलों में से ये कमियाँ हटा दें तो मुगल भी मजबूत बन जायेंगे ।"
उसके बाद से ही राजपूतों में मुगलों ने शराब का प्रचलन चलाया और धीरे-धीरे राजपूत शराब में डूबते चले गए और अपनी इष्ट देवी को नाराज करते गए । मुगलों ने मुसलमानों को कसम दिलवाई कि शराब पीने के बाद नमाज नहीं पढ़ी जाये । इसलिए इससे दूर रहिये ।
मांसाहार जैसी राक्षसी प्रवृत्ति पर गर्व करने वाले राजपूतों को यदि ज्ञात हो तो बतायें और आत्म मंथन करें कि "महाराणा प्रताप की बेटी की मृत्यु जंगल में भूख से हुई थी, क्यों ? यदि वो मांसाहारी होते तो जंगल में उन्हें जानवरों की कमी थी क्या, मारकर खाने के लिए ?"
इसका मतलब कि राजपूत हमेशा शाकाहारी ही थे । केवल कुछ स्वार्थी राजपूतों ने जिन्होंने मुगलों की आधिनता स्वीकार कर ली थी, वे राजपूत मुगलों को खुश करने के लिए उनके साथ मांसाहार करने लगे और अपने आपको मुगलों का विश्वासपात्र साबित करने की होड़ में गिरते चले गये ।
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